पाठ्यक्रम: GS2/ शासन, GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- संसद ने इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित कर दिया है।
इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी संहिता (IBC), 2016 क्या है?
- IBC को 2016 में भारत में बढ़ते अप्रदर्शनकारी परिसंपत्तियों (NPAs) और अप्रभावी ऋण वसूली तंत्र को संबोधित करने हेतु प्रस्तुत किया गया था।
- इसका उद्देश्य कॉर्पोरेट संकट समाधान प्रणाली में सुधार करना था, जिसमें देनदार-नियंत्रित व्यवस्था को हटाकर ऋणदाता-नियंत्रित तंत्र स्थापित किया गया, ताकि समयबद्ध समाधान सुनिश्चित हो सके।
- IBC समाधान के प्रमुख उद्देश्य:
- व्यवसाय पुनर्जीवन: पुनर्गठन, स्वामित्व परिवर्तन या विलय के माध्यम से व्यवसायों को बचाना।
- परिसंपत्ति मूल्य का अधिकतमकरण: देनदार की परिसंपत्तियों के मूल्य को संरक्षित और अधिकतम करना।
- उद्यमिता एवं ऋण को बढ़ावा: उद्यमिता को प्रोत्साहित करना, ऋण उपलब्धता में सुधार करना और ऋणदाताओं एवं देनदारों सहित हितधारकों के हितों में संतुलन स्थापित करना।
IBC (संशोधन) विधेयक, 2026 की प्रमुख विशेषताएँ
- लिक्विडेशन की समयसीमा: NCLT को आवेदन या सूचना की तिथि से 30 दिनों के अंदर परिसमापन का आदेश पारित करना होगा। परिसमापन कार्यवाही 180 दिनों में पूर्ण होनी चाहिए, जिसे अधिकतम 90 दिन तक बढ़ाया जा सकता है।
- CIRP का अनिवार्य प्रवेश: विधेयक में प्रावधान है कि यदि चूक सिद्ध हो और आवेदन पूर्ण हो तो NCLT को 14 दिनों के अंदर दिवालियापन आवेदन स्वीकार करना होगा। इस समयसीमा पर न्यायिक विवेकाधिकार समाप्त कर दिया गया है।
- सीमापार दिवालियापन: विदेशी परिसंपत्तियों/ऋणदाताओं से जुड़े मामलों के समाधान हेतु ढाँचा प्रस्तुत किया गया है।
- वैधानिक देयों पर स्पष्टीकरण: विधेयक स्पष्ट करता है कि वैधानिक देयों को सुरक्षित ऋण नहीं माना जाएगा। इससे सुनिश्चित होता है कि दिवालियापन समाधान के दौरान सरकारी देयों को सुरक्षित ऋणदाताओं पर प्राथमिकता नहीं मिलेगी।
- परिसमापन प्रक्रिया में परिवर्तन: परिसमापक की अर्ध-न्यायिक शक्तियाँ समाप्त कर दी गई हैं।
- ऋणदाताओं की समिति (CoC) को परिसमापक की नियुक्ति/हटाने और परिसमापन प्रक्रिया की निगरानी का अधिकार दिया गया है।
- CIIRP (ऋणदाता-प्रेरित दिवालियापन समाधान प्रक्रिया) का परिचय: विधेयक ने एक नई व्यवस्था प्रस्तुत की है, जिसके अंतर्गत चुनिंदा वित्तीय संस्थान न्यायालयीय प्रक्रिया से बाहर दिवालियापन कार्यवाही प्रारंभ कर सकते हैं।
चिंताएँ
- परिसमापक की भूमिका का ह्रास: मूल संहिता में परिसमापक को दावों की अंतिमता सुनिश्चित करने हेतु अर्ध-न्यायिक शक्तियाँ दी गई थीं। इन शक्तियों को हटाने से दक्षता कम हो सकती है और CoC पर निर्भरता बढ़ सकती है, जिससे विलंब और विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
- CIIRP तक सीमित पहुँच: यह व्यवस्था केवल सरकार द्वारा अधिसूचित चुनिंदा वित्तीय संस्थानों द्वारा ही प्रारंभ की जा सकती है। इससे ऋणदाताओं के बीच असमानता और चयन मानदंडों पर अस्पष्टता की आशंका है।
- आवेदन वापसी पर प्रतिबंध: विधेयक में प्रावधान है कि CoC गठन से पूर्व और समाधान योजनाओं के आमंत्रण के बाद आवेदन वापसी पर प्रतिबंध होगा। इससे प्रारंभिक समझौते और न्यायालय से बाहर समाधान हतोत्साहित हो सकते हैं।
निष्कर्ष
- IBC संशोधन, 2026 संहिता के ढाँचे में एक महत्वपूर्ण विकास है, जो दक्षता बढ़ाने, ऋणदाताओं की भागीदारी सुदृढ़ करने और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को सम्मिलित करने की दिशा में कदम है।
- इन सुधारों की पूर्ण क्षमता को साकार करने हेतु प्रभावी कार्यान्वयन और संस्थागत क्षमता अत्यंत आवश्यक होगी।
Source: AIR